यमुना पाठक ने हैदराबाद के नालसार विश्वविद्यालय में उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि सीबीएफसी द्वारा पहले ही इस बिना प्रमाणित डॉक्यूमेंट्री की सार्वजनिक स्क्रीनिंग पर आपत्ति जताई जा चुकी है, फिर भी नालसार ने इसे प्रदर्शित करने की अनुमति कैसे दे दी। पाठक के अनुसार यह कदम कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है।
पाठक ने सवाल किया कि क्या नालसार जैसे प्रमुख कानून विश्वविद्यालय को वैधानिक नियमों की अनदेखी का अधिकार है। उन्होंने पूछा कि अगर संस्थान स्वयं कानून का सम्मान नहीं करता तो आम नागरिकों से कानून का पालन करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उनका कहना था कि छात्रों को सबूतों की जांच करना सिखाया जाना चाहिए, न कि भावनात्मक रूप से किसी आरोपी को राजनीतिक नायक बनाना।
उन्होंने जोर दिया कि अकादमिक स्वतंत्रता का मतलब कानून को दरकिनार करना या गंभीर आरोपों को छिपाना नहीं हो सकता। सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग राजनीतिक प्रचार के लिए नहीं किया जाना चाहिए। पाठक ने नालसार से मांग की कि वह तुरंत बताए कि स्क्रीनिंग की अनुमति किसने दी, क्या सीबीएफसी का प्रमाणपत्र या छूट ली गई थी, और उल्लंघन के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए।
पाठक का मानना है कि संविधान के रक्षकों को तैयार करने वाले संस्थान कभी भी कथित कानून तोड़ने वालों को महिमामंडित करने वाले मंच नहीं बनने चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया अभी चल रही है, ऐसे में किसी यूएपीए आरोपी को राजनीतिक कैदी या नायक के रूप में पेश करना नियम के खिलाफ है। संस्थानों को कानून का सम्मान बनाए रखना चाहिए।




