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अमेरिका से आ रही है भारत की आधी से ज्यादा एलपीजी, रूसी तेल नहीं ये है असली बड़ा बदलाव

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता देश है। साल 2025 में भारत ने करीब 2.185 करोड़ टन एलपीजी का आयात किया था, जिसमें लगभग 90 प्रतिशत मध्य पूर्व से आता था। घरेलू खपत का करीब 66 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा होता है। एलपीजी मुख्य रूप से घरेलू ईंधन के रूप में इस्तेमाल होती है, इसलिए इसकी आपूर्ति बहुत महत्वपूर्ण है।

मध्य पूर्व में हो रहे संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी के कारण खाड़ी देशों से आने वाली एलपीजी सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। पहले मध्य पूर्व से 85-90 प्रतिशत एलपीजी आती थी, लेकिन अब आपूर्ति बाधित होने से भारत को अन्य स्रोतों की तलाश करनी पड़ी। इसी दौरान अमेरिका ने भारत के लिए एलपीजी का सबसे बड़ा सप्लायर बनकर उभरना शुरू किया।

जनवरी 2026 में अमेरिका का हिस्सा सिर्फ 12 प्रतिशत था, जो मार्च में 36.9 प्रतिशत हो गया। मई में यह 50 प्रतिशत पार कर गया और जुलाई में 73 प्रतिशत तक पहुंच गया। अगस्त में भी अमेरिका ने 55.4 प्रतिशत एलपीजी सप्लाई की। यूएई, कतर और सऊदी अरब का हिस्सा काफी घट गया। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एलपीजी निर्यातक है और उसकी प्रोपेन कीमतें अपेक्षाकृत सस्ती हैं, इसलिए भारत ने लंबी दूरी और ऊंची फ्रेट लागत के बावजूद वहां से खरीद बढ़ा दी।

अमेरिका से आने वाली एलपीजी में समय और लागत ज्यादा लगती है। मध्य पूर्व से जहाज 3-4 दिन में पहुंच जाते थे, जबकि अमेरिका से 30-45 दिन लगते हैं। फ्रेट रेट भी बढ़ गए हैं। फिर भी आपूर्ति सुरक्षा प्राथमिकता है। साथ ही, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की चर्चा, दीर्घकालिक अनुबंध और अमेरिकी प्रोपेन उत्पादन में वृद्धि भी इस बदलाव के पीछे प्रमुख कारण हैं। भारत सरकार ने कंपनियों को 2027 के लिए अमेरिकी सप्लायरों से कम से कम 15 प्रतिशत आयात करने को कहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति सामान्य हो जाती है तो अमेरिका का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा टिकना मुश्किल है। लेकिन आपूर्ति सुरक्षा और व्यापारिक संबंधों को देखते हुए अमेरिका लंबे समय तक भारत के एलपीजी आयात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा। भारत अपनी आपूर्ति विविधता बढ़ाने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रहा है।

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